Happy Teachers Day 2020 : शिक्षक दिवस पर निबंध

शिक्षक दिवस के बारें में 



हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिनका जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु में हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के कारण उनके जन्म दिवस पर हमारे देश में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 

ये भारत के दुसरे राष्ट्रपति पद पर भी आसीन रहें जिनका कार्यकाल 1962-1967 था। इन्हें 1931 में नाईटहुड की उपाधि से भी नवाजा गया। 

एक शिक्षक के रूप में इन्होनें 40 वर्ष तक अपना योगदान दिया। ये एक महान दार्शनिक ,प्रख्यात शिक्षक एवं भारतीय संस्कृति के संवाहक थे उनके इन्हीं प्रखर गुणों के कारण 1954 में इन्हें भारत रत्न के उपाधि प्रदान की गई।

शिक्षक दिवस का महत्व 


हमारा देश हिंदुस्तान जहाँ सदियों से गुरु शिष्य का रिस्ता अहम एवं पवित्र हिस्सा रहा है यहाँ ऐसे ऐसे शिष्य हुए जिसनें अपने गुरु के खातिर अपना जीवन त्याग दिया।

ऐसे में एक शिष्य एकलव्य की कहानी का छोटा सा सारांश आपलोगों के समक्ष लिख रहा हूँ। 

एकलव्य जो हिंदू महाकाव्य महाभारत के पात्र हैं। इनके बचपन का नाम अभिधुम्न था। इनका जन्म एक निषाद परिवार में हुआ था।

महाभारत के अनुसार एकलव्य धनुर्विद्या सिखने के उद्देश्य से गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में गए लेकिन निषाद परिवार में जन्म के कारण उन्होंने धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया।

इस बात से बिना आहत एकलव्य ने हिम्मत नहीं हारी और जंगल में अकेले रहकर द्रोणाचार्य की मूर्ती बनाई और उनकी मूर्ति को सामने रखकर अभ्यास करने लगे।

इस बात का पता द्रोणाचार्य को तब चला जब पांडव तथा कौरव उसी जंगल में आखेट के लिए गए जहाँ एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था।

उनलोगों का एक कुत्ता एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा और एकलव्य को देखकर भौकने लगा जिससे अभ्यास की साधना में दिक्कत होने लगी।

एकलव्य ने उस कुत्ते का मुंह बन्द करने के लिए कुत्ते के मुंह में एक ऐसा बाण मारा जिससे कुत्ता चुप हो गया और भागे भागे द्रोणाचार्य के आश्रम में पहुँचा।

कुत्ते की ऐसी दशा पाकर द्रोणाचार्य और पांडव हक्का बक्का रह गए। उन्होने तीर मारने वाले की खोज बिन शुरु की। जब वे एकलव्य के आश्रम पहुँचे तो उन्हें उसे देखकर आश्चर्य हुआ।

क्युंकि एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर अपने सामने रखकर अभ्यास कर रहा था। उन्हें इस बात का आश्चर्य हुआ क्यूंकि एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य को मानस गुरु मानकर धनुर्विद्या सिखा था।

एक तथ्य के अनुसार एकलव्य ने गुरूदक्षिणा के तौर पर अपना अंगूठा काटकर द्रोणाचार्य के चरणों में रख दिया। फिर भी धनुर्विद्या में वह कुशल था।

इसलिये कहा जाता है की भारत में गुरु शिष्य का जो परम्परा है वह अद्वितीय हैं।

शिक्षक दिवस पर अपने कुछ विचार 



गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः
गुरुर साक्षात परब्रह्म:, तस्मै श्री गुरुवे नमः


गुरु जो ब्रह्मा के समान हैं, गुरु जो विष्णु के समान हैं 
गुरु जो सभी देवों में परंब्रह्मा के समान है ऐसे गुरु का हमारा नमन हैं।

गुरु जिसके बिना एक छात्र का जीवन असंभव हैं। हमारे जीवन का प्रथम गुरु तो हमारे माता पिता ही हैं जो हमें जन्म देते हैं लेकिन एक जीवन जीने का सार हमें गुरु सिखाते हैं।

एक सही दिशा में चलने का रास्ता हमें गुरु सिखाते हैं। एक कामयाब जीवन के मार्ग पर चलने का रास्ता हमें गुरू ही बताते हैं। लेकिन आज का जो हालात हैं इसके विपरित हैं। 

शिक्षक दिवस पर छात्रों का उत्साह 



5 सितंबर के दिन बच्चें काफी उत्साहित होते हैं। वे अपने स्कूल के शिक्षकों को उपहार भेट करते हैं उनके सम्मान के लिए।

इस दिन किसी किसी स्कूल या कालेज में छात्र एक शिक्षक के रूप में ऐक्टिंग करते हैं। और अपना विचार अपने गुरु के सामने रखते हैं।

शिक्षक दिवस सिर्फ शिक्षकों के लिए ही नही छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। क्यूंकि इस दिन गुरु हमें एक शिक्षक बनने का गुड़ सिखाते हैं।

आने वाली परिस्थिति से लड़ने का मंत्र बताते है। एक अच्छा समाजिक, सज्जन व्यक्ति के गुणों के बारें में हमें बताते हैं। हमें सामाजिक परिस्थितियों से अवगत कराते हैं।

इस दिन भारत सरकार द्वारा देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है।


             " गुरु हमारे जीवन का आधार शिला हैं।
   ये पीपल के पेड़ की तरह हैं जो हमें हमेशा धूप से बचाते हैं। "

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