आत्महत्या - Suicide एक सामाजिक समस्या पर अपने कुछ विचार

हमारे समाज के लोग आत्महत्या (suicide) क्यूँ कर रहें हैं ? अपने इस अनमोल जीवन को क्यूँ फंदे पे लटका रहें हैं ?




जैसा की आजकल हम अपने आसपास पड़ोस में देख रहे हैं कि लोग आत्महत्या कर रहें हैं। इस प्रकार की घटना दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे हैं जो की एक खतरनाक सामाजिक समस्या हैं।

और इस प्रकार की घटनाएं हमारे समाज में सबको विचलित कर रहा हैं। हर दिन कहीं न कहीं इस प्रकार की घटनाएं घट रहीं हैं जो की हम मानव समाज के लिए एक चिंता का विषय हैं।

जैसा की आज हमें शुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की खबर शोशल मिडिया के माध्यम से मिला जो कि एक मशहूर फ़िल्मकार थे उन्होनें बहुत सारी फ़िल्मों में काम किया जैसे:- M.S.Dhoni ,kai Po Che, Chhichhore etc जो इंटरटेंंनमेंट बाॅक्स ऑफिस पर काफी धमाल मचाया।

फ़िल्म "छिछोरे"  में उन्होनें खुद्खुशी ना करने की नसीहत भी लोगों के बीच दिखाई। उस फिल्म का एक लाईन जो आपको याद दिलाएगा  

  "हम सब ग़लत कर रहे हैं भाई, Success के बाद का      Plan सबके पास है लेकिन अगर ग़लती से Fail हो गए तो  Failure से कैसे Deal करना है कोई बात ही नहीं करना चाहता।"

 फिर भी  वे इस फंदे से नही बच पाये। बहुत दुख हुआ सुनकर।

ऐसे बहुत सारी घटनाएँ रोज हमारे बीच देखने को मिलती हैं। जो हमें काफी दुखद एहसास कराती हैं।

आखिर लोग क्यूँ आत्महत्या करते हैं ? क्या ये अपने जिंदगी से तंग आ गए थे ? या इन्हें किसी साजिश के तहत मारा गया।

खैर इसका तो अंत नही हो सकता हैं क्यूंकि लोगों की अपनी जिंदगी होती हैं। वो इसे कैसे हैण्डल करते हैं ये तो उनपर ही निर्भर करता हैं । लेकिन क्या ऐसा करना गलत नही हैं जुर्म नही हैं।

आइये जानते हैं एक सरल भाषा में 


मेरा मानना हैं कि आत्महत्या एक जुर्म हैं क्यूंकि इस जुर्म को हम अपना जीवन समझ कर गले लगाते हैं।

लेकिन सच तो ये हैं की ये हमारा जीवन नही हैं। हमारे जीवन से हमारे परिवार का जीवन जुड़ा हैं।

हम आवेश में आकर अपने आप को खत्म कर लेते हैं लेकिन इस कदम का असर हम पुरे परिवार को जिंदगी भर भुगतना पड़ता हैं। इसलिए मैं इसे जुर्म कहता हूँ और धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो आत्महत्या महापाप हैं।
हम सभी जानते हैं कि हम इस दुनिया में अपने माता पिता के द्वारा आयें हैं जो हमारी पैदाइश होते ही हम पर एक कर्ज होता हैं।

ये हमारी देखभाल अपने से बढ़कर करते हैं। हमारी हर जरूरतों का ख्याल रखतें हैं हमे पाल-पोष कर बड़ा करते हैं। हमें दुनियादारी बातों की शिक्षा देते हैं ताकि हम हर जगह अपना कदम सम्भाल कर चलें।

इसलिए मैं इसे अपने ऊपर एक कर्ज मानता हूँ।

हम जानते हैं की इस कर्ज को उतारा नही जा सकता फिर भी हमारी कोशिश रहती हैं की उनके असुलो पर खड़ा उतरे।

जब हम बड़े हो जाते हैं तो ये (माता-पिता) हमारी शादी कर के अपना फ़र्ज अदा करते हैं और हमें अपना खुशहाली जीवन जीने का आशीर्वाद देते हैं।

लेकिन हम जब बड़े हो जाते हैं तो हम पर तरह-तरह की जिम्मेदारियाँ आती है। नए नए चुनौती का सामना करना पड़ता हैं। बिजनेस हो चाहे नौकरी अपने कामों की वजह से परेशान होते हैं या कोई और वजह जैसे पारिवारिक समस्या, प्रेम प्रसंग इत्यादि।

ऐसी स्थिति में ही हम कोई गलत कदम उठाते हैं।

हालाकि हमारे देश में ज्यादातर आत्महत्या प्रेम प्रसंग मामलें पर ही होता है ये मैं मानता हूँ।

लेकिन बात समस्या का नही है इसे आप हैण्डल कैसे करते हैं इसका है।


इस चुनौती से लड़ने के कुछ अपने विचार  


जब भी हम ऐसी स्थिति (आत्महत्या के मूड में) में हो तो सबसे पहले हमें अपने जिम्मेदारियों को याद करना चाहिये। अपने ऊपर उस कर्ज को याद करना चाहिए जिसकी वजह से हम इस दुनिया में आये।

अपने परिवार के बारें में सोचें जो आप पर निर्भर है।

या आप जब भी टेंशन में हो तो घर आ जाएँ। सब कुछ छोड़कर अपने बच्चों के साथ समय बितायें।

अगर बच्चें घर पर ना हो तो आसपास में क्रिकेट संबंधी खेल खेलें इससे आपका तनाव खत्म हो जायेगा। या सो जाये इससे आपका गुस्सा खत्म हो जायेगा।

हम सभी जानते हैं कि जिंदगी के इस सफ़र में कभी ना कभी ऐसे स्थिति का सामना करना पड़ता है जिसमें जीने मरने की बात आ जाती हैं लेकिन भाईयों एवं बहनों हमें अपने जिम्मेदारियों से भागना नही हैं इस चुनौती को स्वीकार करना हैं और उसे मात देना हैं।

                 "आत्महत्या करना महा पाप हैं
            आप भी बचें और दुसरों को भी बचाएँ।"


                    (Written by :- Meraj Hashmi)

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